Posted by: santoshjalanpink | जनवरी 20, 2010

सामाजिक बदलाव की लहर

इस देश में  मनुष्य की प्रगति , विकास को रोकने के लिए शिक्षित ,बुद्धिजीवी ,ज्योतिस्सास्त्र, अनेक तरह के सामाजिक रुढिवादिता  अंधाविवास उतरदायी है|
हम जीने को तो २१ वी सतबादी में है लेकिन अपने स्वार्थ के अनुसार सोच बदल लेते है|
कभी अंधविस्वास का सहारा लेकर , कभी आधुनिकता के नाम पर जिस तरह मतलब पूरा हो वही रास्ता अपना लेते है
हमारे समाज में औरतो की स्तिथि में कभी बदलाव आयेगा ?
तब से लेकर आज तक भी उसे आश्रित हीसमझा जाता है बिना किसी छाया के वो सुरक्षित नहीं है कभी पिता के अधीन,कभी पति के अधीन,कभी बेटे के अधीन |
शायद अधीनता के साथ ही उसका जनम होता है तभी जन्म के साथ ही अफसोस,दुख, कोसना ,शुरू हो जाता है|
पुरुषो  की तरह वह भी स्वतंत्र रहना चाहती है|  पुरुष  लाख पाप करे माफ है स्त्री करे तो वो कुलटा, पापी, कुलाक्क्षानी और  अपवित्र है|



Posted by: santoshjalanpink | अगस्त 16, 2009

आराधना :

सारी दुनिया से हार भगवन आया   तुम्हरे  द्वार नैया  पार लगाओ जी

तेरा सहारा न मिले तो जीवन है बेकार

तेरी सीतल छाव में हमें मिलती है फुहार

इस मंद मंद अहसास में मेरा मन करता उलहास

मन के सुने आँगन में तुम अब  कर लो  अपना निवास

जीवन  सफल बनाये  जी

Posted by: santoshjalanpink | अप्रैल 8, 2009

बचपन की यादे

बचपन की एक चोरी मुझे  आज भी याद है |  मैंने एक रूपया बड़ी दीदी की बॉक्स से चुराया ठा | उस समय का एक रूपया  चार दिन का टिफिन के लिए होता था | हम सब दोस्त एक साथ रुपये इकठे कर के नास्ता करते थे | मुझे एक सपथ में एक रूपया मिलता था |मै मेरी एक गहरी दोस्त से उधार लेकर वयवसथा करती थी एक दिन सबने मिलकर मेरा मजाक बनाया  |
मेरी गहरी दोस्त ने कहा की मै तुम्हे और पैसा नहीं दे पावएगी |इसलिए मने चोरी की लेकिन उस चोरी के बाद मेरा मन मुझे हर वक़्त यह अहसास दिलाता रहा की मैंने गलत किया |फिर मैंने अपने मन में यह निश्चय किया की यदि मेरे माता पिता मुझे ज्यादा पॉकेट मनी नहीं दे सकते तो मुझे मेरे इन साथियों का साथ छोड़ देना चाइए  मैंने उनका साथ छोड़ दिया |लेकिन इस घटना का
मेरे दिल पर गहरा असर पडा |मुझे अपने पर आत्मग्लानी हुई  फिर कभी भी जिन्दगी में चोरी न करने की कसम खाई |

आज पहली बार मै अपने  आप को हल्का महसूस कर रही हूँ |     धन्यवाद वर्ड प्रेस

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