इस देश में मनुष्य की प्रगति , विकास को रोकने के लिए शिक्षित ,बुद्धिजीवी ,ज्योतिस्सास्त्र, अनेक तरह के सामाजिक रुढिवादिता अंधाविवास उतरदायी है|
हम जीने को तो २१ वी सतबादी में है लेकिन अपने स्वार्थ के अनुसार सोच बदल लेते है|
कभी अंधविस्वास का सहारा लेकर , कभी आधुनिकता के नाम पर जिस तरह मतलब पूरा हो वही रास्ता अपना लेते है
हमारे समाज में औरतो की स्तिथि में कभी बदलाव आयेगा ?
तब से लेकर आज तक भी उसे आश्रित हीसमझा जाता है बिना किसी छाया के वो सुरक्षित नहीं है कभी पिता के अधीन,कभी पति के अधीन,कभी बेटे के अधीन |
शायद अधीनता के साथ ही उसका जनम होता है तभी जन्म के साथ ही अफसोस,दुख, कोसना ,शुरू हो जाता है|
पुरुषो की तरह वह भी स्वतंत्र रहना चाहती है| पुरुष लाख पाप करे माफ है स्त्री करे तो वो कुलटा, पापी, कुलाक्क्षानी और अपवित्र है|